*श्रद्धा सुमन अर्पित करती एक भावपूर्ण कविता:*
*दीपथींजो आंधियों में भी जलती रहीं*
**धर्म-धरा की दीप-ज्योति, अहिल्या माँ महान,
नारी शक्ति की मिसाल थीं, थीं सत्य का विधान।
त्याग-तपस्या की प्रतिमा, ममता की मूरत,
जननी, शासक, संत बनी, हर रूप में पूज्य थीं |
राजसिंहासन पे बैठी, पर मन में था धैर्य,
हर निर्णय में नीति बसी, न छल, न कोई वैर।
किले नहीं, मंदिर बनाए, गंगा-तीरे घाट,
भक्ति में लीन हो गईं, बनकर माँ की बात।
तीर्थों को संवार दिया, उजड़ा जहाँ, वहाँ प्राण,
काशी, गया, द्वारका बोले – ‘जय अहिल्या महान!’
अन्याय से लड़ीं नहीं तलवारों की मार से,
बलिदान हुआ उनका, सेवा-संस्कार से।
मातृभूमि की शान बनीं, नारी गरिमा का नाम,
आज भी गूंजे स्वर उनका, लेके सच्चा प्रणाम।
जयंती पर प्रण करते हैं, चरित्र को अपनाएं,
अहिल्या माँ की राह चलें, सच्ची सेवा दिखाएं।
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**आपका जीवन हमारे लिए प्रेरणा है।**
स्वरचित
तनुजा

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