स्वस्थ समाज की कल्पना तभी की जा सकती है जब उसकी आधी आबादी, यानी महिलाएँ, शारीरिक और मानसिक रूप से पूर्ण रूप से स्वस्थ हों। किंतु आज भी यह एक कड़वा सच है कि अधिकतर महिलाएँ अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं देतीं। वे परिवार, बच्चों, घर और कार्यस्थल की ज़िम्मेदारियों में इस कदर उलझ जाती हैं कि स्वयं की देखभाल को अनदेखा कर देती हैं। यह लापरवाही धीरे-धीरे गंभीर बीमारियों का रूप ले सकती है।
भारत जैसे देश में महिलाओं को बचपन से ही त्याग, सहनशीलता और सेवा की मिसाल बना दिया जाता है। वे अपने स्वास्थ्य की शिकायत करना एक प्रकार की कमजोरी समझती हैं। मासिक धर्म, रजोनिवृत्ति, पोषण, मानसिक तनाव, स्तन और गर्भाशय से जुड़ी समस्याओं पर खुलकर बात करना आज भी एक वर्जना है। यह चुप्पी कई बार जानलेवा सिद्ध हो सकती है।
विशेष रूप से किशोरियों और गर्भवती महिलाओं में कुपोषण और एनीमिया एक बड़ी चिंता का विषय है। आयरन, कैल्शियम और प्रोटीन की कमी से महिलाओं में कमजोरी, थकान, और प्रसव संबंधी जटिलताएँ आम हो जाती हैं। इसके समाधान हेतु संतुलित आहार और नियमित स्वास्थ्य जांच अनिवार्य है।
महिलाएँ अक्सर मानसिक तनाव, अवसाद और चिंता का शिकार होती हैं, परन्तु वे इसे समाज के डर से व्यक्त नहीं कर पातीं। घरेलू हिंसा, सामाजिक अपेक्षाएँ, आर्थिक निर्भरता और कार्यस्थल का तनाव उनकी मानसिक स्थिति को प्रभावित करते हैं।
#**क्या करें महिलाएँ स्वयं के लिए?**
* **नियमित स्वास्थ्य जांच कराएं।**
* **मासिक धर्म और प्रजनन स्वास्थ्य के विषय में सही जानकारी प्राप्त करें।**
* **संतुलित आहार और व्यायाम को दिनचर्या में शामिल करें।**
* **मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें और ज़रूरत पड़े तो विशेषज्ञ से परामर्श लें।**
* **स्वयं को प्राथमिकता देना अपराध नहीं, आत्मसम्मान है।**
### **परिवार और समाज की भूमिका**
परिवार के सदस्य, विशेष रूप से पति, माता-पिता और संतान, को महिला की देखभाल में सहयोगी बनना चाहिए। समाज को चाहिए कि वह महिला स्वास्थ्य पर खुले मंच बनाए, जागरूकता फैलाए और उनकी जरूरतों को समझे।
स्वस्थ महिला न केवल स्वयं के लिए, बल्कि पूरे परिवार और समाज के लिए शक्ति का स्रोत होती है। अतः यह समय है स्वयं से यह प्रश्न करने का—**"मैं अपने स्वास्थ्य के प्रति कितनी सजग हूँ?"** क्योंकि एक जागरूक महिला ही स्वस्थ राष्ट्र की आधारशिला रख सकती है।
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स्वरचित
तनुजा शुक्ला
उत्तर प्रदेश

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