Wednesday, May 14, 2025

मेरी प्यारी मां

मेरी मां हो गई अब मांस का लोथड़ा सा ज़रा सा छोड़ो तो लुढ़क जाती है इधर उधर। गिर न जाए लगता है डर हो रहा है कंकाल तन अब तुम्हारा । मां तुम क्यों अब सिमटने लगी हो?
आया है अब जो वक्त मेरे इम्तेहान का पाया है तुम्हारी सेवा का अवसर तो मुझसे अब दूर क्यों जाने लगी हो? मां तुम क्यों अब सिमटने लगी हो?
लगाया सीने से चिपका के तुमने, ना पाई कमी हमने अपनी परवरिश में। सजाया, संवारा हसरतों से सदा ही रखा छांव में खुद रही हो तपिश में।।
बड़े चाव से मां तुम बनाती थी भोजन। खिला के हमें, करती थीं स्वयं तृप्त मन।। गज़ब स्वाद होता था मां तुम्हारे करों में, गया वक्त कैसे?भूल सकते हैं न हम।।
बड़ी हसरतों से हमें गुड़िया सा सजाना। हरेक रात दिन बस हमीं में बिताना।। खिले फूल छः आपकी नन्हीं सी बगिया मे मधुर, मंद मकरंद से उसको महकाया।।
ना पाई कमी कोई जीवन में अपने, हुए पूर्ण सारे जो देखे थे सपने।। मिला साथ पापा का सबको हर कदम पर खिला बागवान, हसीन आशियां बन गया फिर।।
अजब रीति का अब तो आया जमाना। दिवस मातृ का अब लगे हैं मनाना। तुम्हीं से हरेक दिन , मनाऊं क्या इक दिन तुम्हारे ही साए में है हरेक दिन बिताना।।
भरे हैं जो जेहन में संस्कार मां तुमने वही बन गए आज पहचान मेरी। ये कहते हैं सब हूं मैं प्रतिलिपि तुम्हारी, मिले हर जनम में मुझे गोद तेरी ।। ©® ~•संजू पाठक इंदौर,म.प्र.

1 comment:

  1. मां।
    मां तो अपने आप में ही बहुत व्यापक अर्थ वाला शब्द है। जितनी भी व्याख्या करो कम ही है। तुमने अत्यंत भावुक शब्दों द्वारा मां का चित्रण किया है।
    तुम्हारी लेखनी को बहुत बहुत हृदय से नमन करती हूं।.......

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