Friday, October 6, 2023

घर की नायिका और संस्कृति की वाहिका नारी

संस्कारों से ही संस्कृति का सृजन होता है। समाज की संरचना का प्रथम पायदान है घर । और घर की परिकल्पना बिना गृहणी के स्वप्न मात्र है।जी, कहावत भी है"बिन घरनी घर भूत का डेरा"। मकान को घर बनाने में भी संस्कारों की सृजनकर्ता ,,,घर की नायिका का योगदान महान है। राष्ट्रपिता बापूजी कहते थे कि घर की एक बेटी को शिक्षित करो,पूरा परिवार शिक्षित हो जाएगा। एक पूरा परिवार ही नहीं वरन दो परिवारों की शिक्षा एक बेटी के कांधों पर है। नेपोलियन ने भी दावा किया था कि एक सुदृढ़ राष्ट्र के निर्माण के लिए उसे सिर्फ शिक्षित नारियां चाहिए। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि गृहस्थी की यदि कोई धुरी है तो वह है घर की नायिका।यही नायिका पत्नी बहु माँ एवं सास बनकर संस्कृति की अमूल्य धरोहर को पीढ़ी दर पीढ़ी को सौपती जाती है।अपने द्वारा अर्जित मूल्यों गुणों एवं बुजुर्गों से प्राप्त संस्कारों को हस्तांतरित करने का जरिया है घर की नायिकाएं।
प्राचीन परिपाटियों के अनुसार घर की बहु के चयन में उसका खानदान, उसकी माँ के संस्कार देखे जाते थे। बेटी माँ की ही प्रतिमूर्ति होती है। एक संस्कारित नारी ही घर की छत बन परिवार को समेटे रखती है। घर की आदर्श नायिका कभी भी विभाजित करने वाली दीवार नहीं बनती। वह सुई धागे की मानिंद सिल कर रफू कर जोड़ती है,कैंची की माफ़िक़ काटती नहीं। ऐसी ही घर की नायिका संस्कृति की वाहक बनती है। पौराणिक कथाओं में भी प्रमाण उपलब्ध हैं।सुर असुर दानव राक्षस यक्षों के जन्म के पीछे भी उनकी माताओं की मनोवृत्तियां जिम्मेदार हैं । ऋषि कश्यप की कई पत्नियां थी। सुरों की माता धार्मिक व सदाचारिणी थी। दैत्यों की माँ दीति तथा दानवों की दनु दोनों ही व्याभिचारिणी थी ,
जिसका प्रभाव उनकी सन्तानों पर परोक्ष रूप से पड़ा। फिर प्रत्यक्ष प्रभाव तो होता ही है।ध्रुव की माता थी सुनी ति, प्रह्लाद की मधुरानी। यह घर की नायिकाओं की शिक्षा दीक्षा का प्रभाव था कि उनके बच्चे अमर हो गए। विपरीत परीस्थितियों में भी इन्होंने हार नहीं मानी। अतः महापुरुषों की चर्चा से भी यही निष्कर्ष निकलता है कि उनकी महानता का श्रेय घर की नायिकाओं को ही जाता है।
गांधी,विवेकानन्द,शंकराचार्य आदि की प्रसिद्धि के पीछे नारी का ही हाथ रहा है। यदि विद्योत्तमा ना होती तो हिंदी साहित्य को कालिदास नहीं मिलते। जीजा बाई ने दिया वीर शिवाजी, सीता की सीख से तैयार हुए लव कुश। ऐसे अद्वितीय पुत्र ही नहीं वरन बहादुर वीरांगनाएं भी माओं ने तैयार की हैं।दुर्गावती, लक्ष्मी,पद्मिनी,रजिया,अरुणा आसफअली आदि क्या हैं,,, घर की नायिकाओं द्वारा संस्कृति का वहन ही है। और आज के परिपेक्ष्य में भी यह घर की नायिका हर क्षेत्र में परचम लहरा रही है। राजनीति में वह भंडारनायके इंदिरा प्रतिभा है ,अंतरिक्ष में वह कल्पना सुनिता है, वह किरण वेदी भी है,डॉ इंजी क्या नहीं है। ये नायिकाएं ही प्रेरित करती हैं आने वाली पीढ़ी को। अपनी विरासत ये सौंपती जाती हैं। यूँ भी हर पुरुष की प्रगति के पीछे एक नारी का हाथ होता हैं
भारत की संस्कृति सभ्यता की बात करें तो आज भी घर की स्त्री के गर्भवती होते ही एक सहज माकूल माहौल उसके आसपास रचा जाता है। अच्छी धार्मिक पुस्तकें पढ़ने को कहा जाता है,खान पान पर भी ध्यान दिया जाता है। ताकी पेट में पल रहे शिशु पर सकारात्मक प्रभाव पड़े। अभिमन्यु ने माँ के गर्भ में ही चक्रव्यूह प्रवेश का तरीका सीख लिया था। जन्म के बाद से ही माता जैसा सिखाती बच्चा वैसा ही ढल जाता है।यह सच में एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है।नारियां ही अपने बच्चों की प्रथम गुरु हैं। सब कुछ सिखा कर ही बच्चों को अपनी उड़ान भरने को छोड़ती हैं। अतः सही मायने में घर की नायिका ही संस्कृति की वाहक है।
सरला मेहता इंदौर मौलिक

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