दान केवल धन देने का नाम नहीं,
यह हृदय की करुणा और आत्मा की पवित्रता का प्रतीक है।
जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से दान करता है,
वह अपने साथ-साथ समाज के जीवन में भी प्रकाश भर देता है।
दान से अहंकार मिटता है,
सेवा से संस्कार निखरते हैं,
और परोपकार से जीवन सार्थक बनता है।
कहा गया है— *“परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़नम्।”*
जिस हाथ से दान किया जाता है,
वह कभी खाली नहीं रहता।
दान से धन नहीं घटता,
बल्कि सुख, शांति और ईश्वर की कृपा बढ़ती है।
आइए, अपने सामर्थ्य के अनुसार दान करें
और मानवता के इस श्रेष्ठ धर्म को जीवंत रखें। 🌼

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