Sunday, April 20, 2025

यात्रा वृत्तांत (मनोज चतुर्वेदी, मनु)

हाय रे अस्पताल, लगभग पिछले 2 वर्षों से चलते वक्त पैरों का डगमग डगमग रूप से चलना, बैलेंस बिगड़ने जैसी अनुभूति होना और सर के भारीपन से परेशान था। दिल्ली प्रवास के दौरान गुड़गांव स्थित एक प्रसिद्ध अस्पताल में दिखाया, डॉक्टर ने बिना कुछ सुने एमआरआई करने का बोला प्रभा से बात की फिर यह तय हुआ कि इंदौर जाकर ही अपोलो हॉस्पिटल में एम आर आई करवाऊंगा। एक-दो दिन बाद ही मैं इंदौर पहुंच गया और अपोलो हॉस्पिटल के न्यूरो सर्जन डॉक्टर सींघनानी के पास पहुंचा उन्होंने सारे फिजिकल टेस्ट जैसे आंख बंद करके आगे पीछे चलना, उंगलियों की पकड़ और भी वगैरा-वगैरा। कुछ मेडिसिंस लिख दी और घर जाने को कहा। पूछने पर भी बताया कुछ नहीं कि मुझे क्या हुआ है। दो-चार दिन इंदौर रुकने के बाद मैं वापस दिल्ली आ गया फिर इसी बीच एक बार अचानक से मुझे कानपुर जाने का सौभाग्य मिला।कानपुर में रीजेंसी हॉस्पिटल में दिखाने के लिए बब्बन भाई साहब और दीदी के साथ गया। वहां के डॉक्टर सुमित कुमार जो की न्यूरो सर्जन है उन्होंने मेरी समस्याएं सुनी और सिर्फ दो मेडिसिन लिखकर बोल इसे 20 दिन तक लो और कभी कोई दिक्कत हो तो मुझे फोन पर बता देना । मैंने उन्हें बताया कि अब मुझे अगले 6 महीने के लिए शिमला जाना है जहां पर मैं अकेला रहूंगा, पहाड़ों का रास्ता रहेगा, साइट पर भी आना जाना होगा तो उन्होंने मुझे बोला कि कुछ खास तकलीफ नहीं है आपको सिर्फ हार्मोनल इंबैलेंस है जो दवाइयां लिखी हैं उससे वह ठीक हो जाएगा। फिर कभी कानपुर आना हो तो एक बार मुझे दिखा देना। डॉक्टर सुमित कुमार का इतना सेटिस्फेक्ट्री आंसर सुनकर मैं निश्चिंत हो गया। वैसे भी मेरा मानना है कि अन्य शहरों के मुकाबले कानपुर के डॉक्टर ज्यादा योग्य और कम व्यवसायिक हैं। पिछले वर्ष फरवरी में मम्मी का देहावसान हुआ। मैं दिल्ली होते हुए कानपुर गया लेकिन उनके कार्यक्रम के तुरंत बाद इंदौर जाना पड़ा। कानपुर में डॉक्टर साहब को पुनः नहीं दिखा पाया, हालांकि उनकी दवाइयां से मुझे काफी आराम मिल गया। 20 दिन की दवाइयां के कोर्स के बाद 2 महीने बाद मुझे फिर कुछ डिसबैलेंस की समस्या हुई तो मैंने डॉक्टर साहब को फोन किया ,उन्होंने कहा आप यही दवाएं वापस 20 दिन के लिए रिपीट कर दें। बस यूं ही चला रहा। शिमला से गोवा आ गया,  सात आठ महीने गोवा में रहा। अपनी दिनचर्या में योगा- मेडिटेशन को शामिल किया। इस बीच डॉक्टर योगिता पांडे के सप्लीमेंट्स में बी-१२ और मैग्नीशियम रिलैक्स का भी प्रयोग किया जिससे लगभग पूर्ण आराम मिल गया। इस वर्ष फरवरी में मम्मी की वरसी थी पर समय भाव के कारण उनके इस प्रोग्राम में  कानपुर ना जा सका । मम्मी की शांत होने के बाद दीदी को ही अब मैं मां मानता हूं और मार्च में होली आने पर यह तय किया कि मुंबई से लखनऊ होते हुए सीधे कानपुर जाऊंगा ।प्रभा और श्री को भी इंदौर से कानपुर आने का बोल दिया। बिट्टू ने अपने दोस्तों के साथ गोवा प्रोग्राम बना रखा था इसलिए वह कानपुर नहीं आ पाया। लगभग 9 दिन के कानपुर प्रवास के दौरान बड़ा ही आनंद आया। कानपुर पहुंचने ही सबसे पहले मैंने रीजेंसी हॉस्पिटल में जाकर डॉक्टर सुमित कुमार को दिखाया ।उन्होंने एक नया कोर्स लिख दिया दवाएं तो सिर्फ दो ही थी पर उनको खाकर मैं बहुत अनइजी फुल कर रहा था और मानव बिल्कुल अचेतावस्था में ही रहा।  मैंने पूरे महीने की दवाई ले ली थी पर फिर अगले दिन से खाना बंद कर दिया। होली का अवसर था फिर भी मैंने डॉक्टर साहब से बात की उनको समस्या बताई तो उन्होंने कहा कि होली के बाद मुझे मिल लेना। होली के अभी 2 दिन शेष थे तो सबसे पहले भाई साहब दीदी प्रभा प्रियंका श्री और बेटू के साथ अयोध्या राम मंदिर में रामलला के दर्शन किए, सरयू घाट लता मंगेशकर चौक और अन्य स्थान भी देखें। रात्रि में हम सब शहर से वापस आ गए। कानपुर से लखनऊ होते हुए अयोध्या जाते वक्त दीदी ने बताया की सुधा की बेटी स्नेहिल का बंथरा में चाय का एक रेस्टोरेंट है जिसका नाम चाय पर चर्चा है। गूगल मैप पर डाला और जल्द ही हम वहां पहुंच गए। वहां पहुंचकर  सब ने चाय पी। कुछ फोटोस भी खींचे गए।चाय पर चर्चा का सेटअप आम चाय की दुकानों से बिल्कुल अलग था। उच्च दर्जे का साहित्य, अच्छे-अच्छे स्लोगन ,झूलने के लिए एक झूला और अनुशासित स्टाफ। सुधा दीदी ने भी शायद फोन कर दिया था। स्नेहिल से मुलाकात नहीं हो पाई पर स्टाफ ने सभी को  बड़ी आत्मीयता से चाय पिलाई और नाश्ता कराया ।यहां तक कि पैसे लेने से भी मना कर दिया। जाते वक्त रामकिशोर ने एक डायरी प्रस्तुत कर दी जिसमें सभी ने अपने-अपने एक्सपीरियंस लिखे, मैंने भी कुछ लिखा। फिर वहां से आगे बढ़े । सुधा दीदी जिनको की 2016 में शिक्षक दिवस पर शिक्षा में विशेष योगदान के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार दिया जा चुका था। उन्हीं की बेटी है स्नेहिल जिसे 2022 में यह पुरस्कार हासिल हुआ। वह भी एक शासकीय इंग्लिश मीडियम प्राइमरी स्कूल (पायलट प्रोजेक्ट)में प्रिंसिपल है और शौकिया तौर पर चाय पर चर्चा नाम का प्रतिष्ठान भी चला रही है। अयोध्या से लौट कर अगले दिन  परमट के गंगा घाट (क्योंकि व्यस्ततावश और अधिक सर्दी की वजह से महाकुंभ में संगम पर जाने का मौका नहीं मिल पाया था) पर  गंगा नदी में स्नान किया, वोटिंग भी की , वोटिंग के दौरान मैंने "मचलती हुई हवा में छम छम, हमारे संग संग चले गंगा की लहरें " गाना भी गया सभी ने बड़े चाव से सुना और तारीफ भी की। फिर घाट के ऊपर स्थिति प्राचीन शिव मंदिर और कुबेर का मंदिर देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वहां से हम लोग दोपहर में ही घर आ गए। रात्रि में पहली बार भाई साहब और अन्नू के साथ होली की पूजा की परंपरा देखी, जहां होली जलाई गई थी वहां सब ने होलिका दहन के चक्कर लगाए, एक दूसरे के गुलाल लगाया और मिठाइयां बांटी। यह सब देखकर बड़ा अच्छा लगा।अगले दिन होली थी लेकिन हम लोग होली वाले दिन उन्नाव निकल गए जहां सबसे पहले  रेनू , फिर सुधा और बाद में अरुणा दीदी के घर पहुंचे। रेनू ने मुझे भांग वाली ठंडाई पिलाई, मैंने एक गिलास और पिलाने का बोला इससे होली की ख़ुमारी और मावे की गुजियों का आनंद बढ़ता ही जा रहा था। सुनील जीजा जी भी पूरे रंग में थे। प्रभा से सरहज वाले मजाक में मगन थे। खैर शाम को हम वापस दीदी के घर आ गए। अगले ही दिन मैं और प्रभा कुलदेवी के दर्शन करने के लिए जल्दी ही जहानगंज के लिए निकल गए। जीटी रोड अब वैसा नहीं रहा जैसे आज से 5 साल पहले तक हुआ करता था ।हम महज़ ढाई घंटे में ही लगभग 10:00 बजे जहानगंज पहुंच गए रास्ते में गुरसहायगंज में पंडित जी के लिए वस्त्र और मंदिर के लिए पल-फूल मिठाई आदि खरीदें। मंदिर भी अब पहले जैसा नहीं रहा।काफी निर्माण कार्य हो गए हैं और पंडित जी ने बताया कि विधायक निधि से कुछ और भी कार्य अगले माह से प्रारंभ हो जाएं हालांकि इससे पहले जब मैं गांव गया था तब मैं कमालगंज के वीडियो और ब्लॉक प्रमुख से मिलकर आया था कि गांव के मंदिर में दो शौचालय और सोलर लाइट की व्यवस्था की जाए। फतेहगढ़ के तहसीलदार से भी फोन पर बात की थी। उन्होंने भी यह कार्य स्वीकृत शीघ्र करने की बात कही थी। मेरी दिली इच्छा है कि हम अपने खानदान के सभी रिश्तेदारों को एक बार इस मंदिर प्रांगण में देवी मां का रात्रि जागरण करने के लिए आमंत्रित करें सभी आए और एक भव्य आयोजन रामाधीन चतुर्वेदी की संतानों द्वारा किया जाए। मुझे भरोसा है कि मैं एक दिन ऐसा कर भी पाऊंगा ।बस एक उचित दिन का इंतजार है। खैर वहां से गांव के विशाल घर और  मुरारी से मिलने गया । गांव निकलते वक्त मैंने मुरारी से फोन पर बता दिया था कि मैं आ रहा हूं ।वह मेरा इंतजार ही कर रहे थे। चूंकि हमारे यहां होली मनाने की प्रथा शुरू से नहीं है शायद कोई गमी हो गई थी जो आज तक कायम है अतः मुरारी ने दूसरों के घर से नाश्ते का प्रबंध किया था। बातचीत के दौरान मुरारी ने बताया कि लला मैं चाहता हूं की हम गांव में एक चतुर्वेदी कोल्ड स्टोर या ब्रिक फील्ड यानी कि भट्टा लगायें जिसमें तुम सबका भी शेयर रहे और इससे चतुर्वेदी परिवार का नाम भी होगा। इसके लिए उन्होने प्रारंभिक तैयारियां भी कर ली थी और अपना एक खेत जो कि गांव के पास है उसे जूनियर चाचा को देने और जूनियर चाचा का खेत आपस में बदलकर दूर वाले चक में भट्टा या कोल्ड स्टोर लगाने का प्रस्ताव बबलू के सामने रखा। हालांकि बबलू ऊपरी तौर पर तैयार हो गए लेकिन फाइनल निर्णय को चाचा को लेना था उन्होंने यह कहकर कि जब मैं मर जाऊं तब यह सब करना और मुरारी का यह प्रोग्राम धरा का धरा रह गया। मुरारी के बेटे पप्पू ने गाड़ी में आलू का बोरा रख दिया और कहां चाचा आते रहा करो अच्छा लगता है। सब बहू बेटों से मिलने के  पश्चात हमने पुनः कानपुर के लिए प्रस्थान किया और लगभग 3 घंटे बाद हम आईआईटी पहुंच गए। शाम के वक्त बेदू, श्री, प्रियंका और प्रभा के साथ हम जेड स्क्वायर मॉल गए और वेदू- श्री को खूब गेम खिलाए और बाद में पिज़्ज़ा खाकर देर रात वापस घर आ गये। अगले दिन कानपुर में ही कुछ दोस्तों हेमंत और मृत्युंजय के साथ गुड्डा दीदी और संजू के यहां जाने का प्रोग्राम बनाया लेकिन समयाभाव के कारण केवल मृत्युंजय और गुड्डा दीदी से ही मिल सके। हेमंत ने अपने घर खाना भी बनवा लिया था लेकिन देर होने की वजह से उसको मना करना पड़ा। इस दौरान रोज शाम को घर आकर वेदू के द्वारा सुनाए गए ओरिजिनल चुटकुलों का भी रोज आनंद लिया। जिसमें बैटरीफुल इस द बेस्ट। अगले दिन शाम को प्रभा और श्री कानपुर से इंदौर निकल गए और मैं अगले दिन सुबह ही रीजेंसी हॉस्पिटल पहुंचा और वहां के ओपीडी में जो हाल दिखा वह बड़ा ही भयानक ऐसा लग रहा था मानो बीमार इंसान बारिश में जैसी गिजाई एक दूसरे से चिपकी रहती हैं इतनी भीड़ देखकर मुझे  एसी में पसीने आ गए । लाइन में लगकर एडमिशन काउंटर पर पहुंचा तो रिसेप्शनिस्ट ने बताया कि आपको फिर से डॉक्टर की फीस जमा करनी है जो की ₹1200 है मैंने कहा कि मुझे अभी एक सप्ताह भी नहीं हुआ है जिसमें तीन दिन होली की वजह से ओपीडी बंद थी, और डॉक्टर साहब ने भी मुझे आज ही आने को कहा था। बहुत बहस करने के बाद फाइनली जब उन्होंने यह मान लिया तब नहीं जाकर मुझे फर्स्ट फ्लोर पर डॉक्टर साहब के पास जाने का बोला। अस्पताल निर्माण के भी कुछ पैरामीटर होते हैं जिनके बाद ही उनका डिजाइन अप्रूव होता है और फिर कंस्ट्रक्शन का कार्य होता है। लेकिन इस अस्पताल में ना ही किसी वेंटिलेशन की व्यवस्था है और ना उचित गैलरी, न पेशेंट के बैठने की व्यवस्था, ना कामन टॉयलेट, ना पीने वाले पानी की व्यवस्था बस चारों तरफ भीड़ ही भी ऐसा लग रहा था मानो यहां पर इलाज मुफ्त में किया जाता है। सीढियों पर भी पेशेंट और उनके साथ के लोग गिजाई जैसे खड़े हुए थे। गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन मुझे डॉक्टर से मिलना था काफी देर तक इंतजार करने के बाद जब मुझे नहीं रहा गया तो सीधे डॉक्टर के केबिन में पहुंच गया और बताया कि मेरी आज शाम की लखनऊ से मुंबई की फ्लाइट है इसलिए मुझे यहां से 2:00 बजे तक निकलना है। डॉक्टर साहब ने बिना देर किए कहा कि आप निकल जाइए व्हाट्सएप पर मैं आपको प्रिस्क्रिप्शन भेज दूंगा और नीचे जाकर आप अपनी दवाएं वापस कर दें। उनका यह व्यवहार मुझे पसंद आया धन्यवाद देखकर मैं अस्पताल में ही बनाए हुए मेडिकल स्टोर पर पहुंचा जहां पर मैंने दवाई वापस करने का आग्रह किया तो केमिस्ट ने कहा कि आपने दोनों दवाइयां के स्ट्रिप में से एक-एक दवा निकाली है अतः यह दवाइयां वापस नहीं हो पाएंगी। क्योंकि यह दवाई ₹2000 की थी अतः मुझे उनको वापस करना जरूरी भी था। आनन फानन आनंद में अस्पताल की रिसेप्शन पर गया और मैंने कहा कि मुझे एडमिनिस्ट्रेटर और सीएमओ से तुरंत मिलना है। जैसे ही सीएमओ आए मैंने अपनी समस्या बताई साथ में यह भी बताया यह अस्पताल के सारे पैरामीटर फेल हैं, मैंने सारा वीडियो बना लिया है और जल्द ही स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को मेल लिखकर मैं उसकी जानकारी दूंगा। सीएमओ साहब मुझे अपने केबिन में ले गए ।ऑफिस बॉय को पानी पिलाने का बोला और कहा कि आप चाय लेंगे या जूस। मैंने कहा कि मुझे औपचारिकता की जरूरत नहीं है मेरी मेडिसिन वापस होना चाहिए अन्यथा मैं कार्यवाही करने में बिल्कुल पीछे नहीं हटूंगा। अच्छा है कि मुझे आज वापस जाना है अगर मुझे आज नहीं जाना होता तो 3 दिन के अंदर यहां ताले डलवा देता। मैंने उनको बताया कि यह मेरा शहर है, मैं यहां पला बढ़ा हूं, यहां की भोली वाली जनता को आप इस तरीके से बेवकूफ नहीं बना सकते। पूरा पैसा चार्ज करते हैं और इस तरीके की कुव्यवस्थाओं में वह विचारे सुबह से शाम तक झूलते रहते हैं। उन्होंने मेरी दवाएं तुरंत मेडिकल स्टोर पर भेजी और सारे पैसे वापस कर दिए। इस बीच मैंने दीदी और भाई साहब को फोन लगाया और कहा कि यदि कोई दवाई आपको मंगाना हो तो मुझे बता दे। दीदी की दवाइयां लेकर मैं वहां से निकल गया। सीएमओ साहब ने मेरा नंबर लिया और कहा कि सर आपसे मिलकर बड़ा अच्छा लगा। जिसे कोई नहीं जानता उसे आने वाले पल की उपलब्धि विश्व प्रसिद्धि दिला देती है ,कल क्या होंना है वो सिर्फ ऊपरवाला जानता है ।मुझे भी नहीं पता था कि यह घटनाक्रम इस तरह से घटेगा और रिजेंसी हॉस्पिटल में मैं प्रसिद्ध हो जाऊंगा। ये मेरे जीवन की ऐसी घटना थी जब मैं इस दुविधा में था कि अस्पताल के डॉक्टर अच्छे हैं लेकिन अस्पताल की व्यवस्थाएं ठीक नहीं है तो मैं साथ किसका दूं। आजकल ओपीडी के डॉक्टर भी सैलरी पर हो गए हैं उन्हें ओपीडी में मरीजों को देखना ही है। सुबह 9:00 से 1:00 बजे तक का समय देना है। लेकिन फीस का निर्धारण अस्पताल मैनेजमेंट करता है। इस व्यवसायीकरण के युग में अच्छे डॉक्टर का दोहन हो रहा है और अस्पताल गगनचुंबी होते जा रहे हैं जिसमें मूलभूत सुविधाएं तक नहीं होती है। न जाने कितने अस्पताल मेडिकल डिजाइन पैरामीटर में फेल है फिर भी वो धड्डले से चल रहे हैं। जरूरत है कि हम सब इस समय संगठित होकर इस व्यवसायीकरण का विरोध करें, मोदी का साथ दे। विकसित राष्ट्र की परिकल्पना तभी पूर्ण होगी जब चिकित्सा भी निशुल्क होगी और शिक्षा भी निशुल्क होगी।  इसलिए सदैव निश्छलता से सबका साथ निभाओ ये निश्छलता रुकनी नही चाहिए .......। सत्य घटनाओं पर आधारित कहानियां अभी और भी हैं........ मनु, इंदौर।

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