संतान सप्तमी विधि पूजा 🌞🌄
संतान सप्तमी व्रत की शुभकामनाएं सभी माताओं बहनों को, भोलेनाथ और माता पार्वती सभी माँ की संतानों को हमेशा खुश रखें और लंबी उम्र दे 🙏
संतान सप्तमी की सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद व्रत-पूजा का संकल्प लें। घर में किसी स्थान को साफ कर उस पर लाल कपड़ा बिछाएं। परिवार के साथ भगवान शिव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
पानी से भरा कलश लेकर इस पर स्वस्तिक का चिह्न बनाएं और आम के पत्तों से ढंककर इसके ऊपर नारियल रख दें। शुद्ध घी का दीया जलाएं और फूल, चावल, पान और सुपारी चढ़ाएं।
शिवजी को वस्त्र स्वरूप लाल मौली (लाल धागा) चढ़ाएं। खीर-पुरी का प्रसाद और आटे और गुड़ से बने मीठे पुए का भोग लगाएं। संतान सप्तमी व्रत की कथा सुनें। अंत में आरती कर पूजा का समापन करें।
इस दिन व्रत रखें। अपनी इच्छा अनुसार फलाहार कर सकते हैं। इस व्रत में नमक नही खाते है।अनाज को सूरज डूबने के पहले खाते है।आप अपनी इच्छा अनुसार कितनी बार भी मीठा खा सकती हैं।शाम को एक बार पुन: शिवजी के पूजा करने के बाद भोजन कर सकते हैं। इस प्रकार संतान सप्तमी का व्रत करने से संतान की सेहत ठीक रहती है।
🔸संतान सप्तमी व्रत कथा🔸
पौराणिक कथाओं के अनुसार, किसी समय अयोध्या पुरी में राजा नहुष राज्य करते थे। उनकी पत्नी चंद्रमुखी और उसी राज्य में रह रहे विष्णुदत्त नाम के ब्राह्मण की पत्नी रूपवती अच्छी सहेली थी। एक दिन वे दोनों नदी स्नान करने गईं। वहां सभी महिलाएं संतान सप्तमी की पूजा कर रही थी। उन दोनों ने भी व्रत का संकल्प किया लेकिन घर आने पर दोनों भूल गईं।
अगले जन्म में वो रानी वानरी और ब्राह्मणी ने मुर्गी बनी। इसके बाद वे पुन: मानव योनि में जन्म लिया। इस बार रानी चंद्रमुखी मथुरा के राजा की रानी ईश्वरी बनी और ब्राह्मणी का नाम भूषणा था। इस जन्म में भी दोनों में बड़ा प्रेम था। भूषणा को ने इस जन्म में संतान सप्तमी का व्रत किया, जिससे उसे आठ संतान हुई।
लेकिन रानी को इस जन्म में भी संतान नहीं हुई क्योंकि ये व्रत नहीं किया था। भूषणा को पुनर्जन्म की बातें याद थी। उसने ये बात जाकर रानी को बताई। इसके बाद रानी ने भी संतान सप्तमी का व्रत किया, जिसके फलस्वरूप उसे भी संतान सुख मिला।
🔸सूती डोरा या चांदी की चूड़ी का महत्व :
ऐसी मान्यता है कि चांदी की चूड़ी भगवान शिव और माता को अर्पित करने के बाद पहनने से संतान दीर्घायु होता है, साथ संतान सुख में वृद्धि भी होती है।
शास्त्रों के अनुसार रक्षा सूत्र में सात गांठों वाला गंडा बनाकर धारण करने का उल्लेख है, चूंकि इसके अगले वर्ष की संतान सप्तमी तक धारण करना होता है|
ऐसे में रक्षा सूत्र कच्चा होता है,जो साल भर नहीं रह पाता है, इसलिए उसके बदले में सात धारी युक्त चूड़ी को धारण किया जाता है। यह परंपरा युगों से चली आ रही है।
इसके अलावा चांदी को मन का कारक और शांति का प्रतीक माना जाता है। इसे धारण करने वाले को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी नहीं होती हैं।
हिन्दू धर्म में भाद्र पद का विशेष महत्व है। इस माह के पहले पखवाड़े में हलषष्ठी एवं श्री विष्णु अवतार जन्माष्टमी पर विशेष उल्लास से भरा वातावरण रहता है तो दूसरे पक्ष में तीज, गणेश चतुर्थी, ऋषि पंचमी, संतान सप्तमी जैसे व्रतोत्सव आस्था के शिखर का दर्पण बन जाती है।
ॐ नमः शिवाय , जय माता दी, नारी शक्ति वंदन 🙏

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