द्वतीय विश्व युद्ध की विभीषिकाओ से डरकर कायर राजनीतिज्ञों ने ठीक उसी प्रकार सोचना प्रारम्भ कर दिया था , जिस प्रकार कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन सोचने लगे थे, यदि अर्जुन का सोचना अनुचित न होता तो कृष्ण को गीता क्यूं सुनानी पड़ती|गीता का अनुयायी निष्काम कर्म तो करता ही है " अभ्युथाना हि यधर्मस्य" गांडीव पर धनुष चढ़ाए बिना नहीं रह सकता और गांडीवधारी निर्गुट हो ये असंभव है|विगत कुछ दशाब्दियों में कुछ भ्रमित राजनीतिज्ञों ने गुट निरपेक्षता की नीति का कर्ण प्रिय नारा गढ़ लिया है, वे मानते हैं कि आज विश्व दो या अधिक गुटों में बटा हुआ है और ये गुट एक दूसरे को नष्ट करने के लिए प्रयत्न शील हैं|इनकी नीति है कि तमाशबीन बनकर इन गूटों को लड़ने मरने दें और जब रोम जल रहा हो तो भीरू की भांति चैन की बंशी बजाए|अतः स्पष्ट है कि गुट निरपेक्षता की नीति भ्रामक और अपरिपक्व चिंतन पर आधारित है, उसमें न केवल वसुदेव कुटुंबकम की भावना का लोप है अपितु "सर्वे भवंतु सुखिन:" के बजाय "स्वांत: सुखाए की भावना "निहित है|
आज ही क्या सदैव ही मानवता गुटों में बंटी रही है एक गुट राम का रहा है और एक गुट रावण का रहा है, एक गुट पाप का रहा और एक गुट पुण्य का रहा है, एक गुट में समस्त अन्याई और अत्याचारी दुर्योधन के झंडे के नीचे एकत्र होते रहें हैं और दूसरे गुट का सार्थित्व कृष्ण करते आए हैं|आज भी यही गुट नाम बदलकर विद्यमान हैं| दलित, पीड़ित, प्रताड़ित अविकसित मानवता एक ओर शोषक पीड़क वर्ग जोर अजमा रहा है, ऐसी स्थिति में तमाशबीन बनकर एक किनारे अपना दामन बचाए खड़ा रहना मानवता का उपहास है|
"कोइ मरे कोई जिए कबीरा घोल बताशा पिए"की नीति के अनुयाई या तो परमहंस होते हैं या निपट स्वार्थी, परमहंस समाजिक जीव नहीं होता, गहन वनों की गुफाओं का जीव होता है, रहा निपट स्वार्थी ! उससे तो समाज कल्याण की , अथवा विश्व कल्याण की कामना करना ऊथोपिया का निर्माण करने की कामना मात्र है|विज्ञान ने मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने में महत्व पूर्ण भूमिका निभाई है|आज अमेरिका की एक छोटी सी घटना जालौन, झांसी, हमीरपुर वासियों के लिऐ महत्व पूर्ण घटना बन जाती है|पोलैंड के मजदूर यदि हड़ताल करते हैं तो कानपुर, गुजरात, अहमदाबाद के मिल मालिकों में हड़कंप मच जाता है|ऐसे युग में जब "Everything that Concerns Man,Concerns me also"तब गुट निरपेक्षता की नीति आत्मघाती नीति है|जो शिकारियों द्वारा पीछा करने पर शूतुर्ग मुर्ग अपनाता है, अथवा भेड़िए द्वारा हमला करने पर बंदर अपना लेता है, बालू में गर्दन छुपा लेने से पूरा शुतुरमुर्ग नहीं छिप जाता आंखे छिपा कर बैठे रह जानें से मुझे नहीं तो मेरे भाई को भेड़िया उठा ही ले जायेगा|
इतिहास प्रमाण है कि जब जब दो या दो से अधिक गुटों में संघर्ष हुए हैं मध्यस्थ मारा गया है वह इसलिए कि वह इस धोखे में रहा वह तो निर्गुट है जब कि वह किसी न किसी गुट द्वारा घसीट ही लिया गया|अवश्यकता यह नहीं कि हम Wormomger ही बने किन्तु यदि विश्व शान्ति लानी है तो "सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे संंतु निरामय:"का स्वप्न देखना है, तो नेकी और न्याय का सबल गुट बनाना होगा और उसका साथ देना होगा और अपने निहिज स्वार्थ से ऊपर उठकर विश्व रंग मंच पर अपना प्रभाव पूर्ण पार्ट प्ले करने के लिऐ गुट निरपेक्षता की आत्मघाती नीति से अंतिम नमस्कार करना ही पड़ेगा|
जय हिन्द जय भारत

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