Monday, February 19, 2024

स्त्री मन

मौन रहती हूं, नि: शब्द नहीं हूं मैं | आवाज है पर बोलती.....नहीं मैं।।
खबर सब है , मुंह खोलती नहीं मैं । यथोचित सम्मान देती हूं सभी को मैं।।
उम्मीद किसी से रखती कुछ भी नहीं मैं। पहल करती नहीं, किन्तु डरती किसी से नहीं मैं।।
जीत की चाहत नहीं, पर हार मानती नहीं मैं । यूं तो आईने की तरह हूं, परंतु बिखरती नहीं मैं ।।
दर्द से भरी हूं पर जीना छोड़ती नहीं मैं । माना तन,मन से कोमल हूं मैं ।।
पर वक्त पर कठोर तप कर सकती हूं मैं | बात जब लाज पर आए तो जौहर भी कर सकती हूं मैं।।
सीता सी अग्नि परीक्षा दे सकती हूं मैं अनुसुइया सम देवो को बाल गोपाल बना सकती हूं मैं।।
ब्रह्मा की भांति सृजन करती हूं मैं। दुर्गा की भांति असुर-संहारक शक्ति रखती हूं मैं।।
मैं स्त्री हूं, सब कुछ कर सकती हूं मैं। अपनी छठी ज्ञानेंद्रिय से सबको समझ सकती हूं।।
~• स्वरचित तनुजा शुक्ला, कानपुर, (उ. प्र.)

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