Monday, February 12, 2024

शनि शांति हेतु हनुमत उपासना का महत्व

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हनुमान जी और शनि के बारे में चर्चा करें तो हनुमान जी सूर्य के शिष्य हैं और शनि पुत्र। एक संकटमोचक हैं और दूसरे पाप कर्मों के लिए दंडित करने वाले। एक अग्नि व दूसरे वायु से उत्पन्न हुए। दोनों एक दूसरे के घोर विरोधी होते हुए भी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।
एक बार की बात है कि जब रावण का सबसे बड़ा पुत्र इंद्रजीत पैदा होने वाला था तो उसने सभी ग्रहों को अपने पैर के नीचे दबा लिया जिससे उसका पुत्र ग्रहों की सर्वाधिक श्रेष्ठ स्थिति में उत्पन्न हो। देवताओं को चिंता हुई कि यदि ऐसा हुआ तो रावण का पुत्र अजेय हो जाएगा। ऐसी स्थिति में शनि ने कहा - मैं इस संकट से छुटकारा दिला सकता हूं परंतु इसके लिए मुझे रावण के चेहरे पर दृष्टि डालनी होगी। देवताओं ने इस कार्य को अंजाम देने के लिए नारद जी की सहायता ली।
नारद जी ने रावण के महल में प्रवेश करके उसकी इस बात के लिए प्रशंसा की कि उसने सभी ग्रहों को पैरों के नीचे दबा लिया है परंतु नारद जी ने यह भी कहा कि यदि वह इन ग्रहांे की पीठ की बजाय इनकी छाती पर पांव रखे तभी उसकी जीत को जीत माना जाएगा। रावण ने नारद जी की बात मानकर जैसे ही ग्रहों को पलटकर उनकी छाती पर अपना पैर रखा तो शनि ने अपनी क्रूर दृष्टि रावण के मुख पर डाल दी। शनि की दृष्टि पड़ते ही रावण का बुरा समय आरंभ हो गया। रावण ने शनि को दंडित करने के लिए उसे काल कोठरी में डाल दिया।
हनुमान जी जब माता सीता की खबर लेने आए तो उन्होंने काल कोठरी से शनि की चीख पुकार सुनी। तब हनुमान जी ने शनि को इस काल कोठरी से मुक्त कर दिया। तब शनि ने हनुमान जी को वरदान देते हुए कहा कि मैं आपके भक्तों को कभी कष्ट नहीं पहुंचाऊंगा। तभी से शनि प्रदत्त कष्टों के निवारण हेतु हनुमान जी की आराधना की जाती है।
इसी संदर्भ में एक अन्य कथा भी लोकप्रसिद्ध है जिसके अनुसार शनि एक बार हनुमान जी को नीचा दिखाने के मकसद से उनके कंधे पर चढ़ गए। तभी हनुमान जी ने अपने शरीर को इतना बड़ा कर दिया कि शनि हनुमान जी के कंधों और छत के बीच में फंसकर दर्द से कराहने लगा। शनि ने फिर हनुमान जी से अपनी मुक्ति के लिए प्रार्थना की और इसके बदले में वचन दिया कि वे उनके भक्तों को कदापि कष्ट नहीं देंगे।
तब शनि ने अपने घावों से होने वाली पीड़ा से मुक्ति प्राप्ति हेतु हनुमान जी से काले तिल और तेल का आग्रह किया ताकि वे उसका लेप बनाकर अपने घावों पर लगा सके। तब से शनिवार के दिन शनि के लिए काले तिल व तेल चढ़ाने व साथ ही हनुमत उपासना की परंपरा प्रचलित है। हनुमान और शनि का संबंध
हनुमानजी और शनि देवता की कहानी का एक आध्यात्मिक महत्व है। हर बार गर्व और अहंकार से भरे शनि विनम्र हनुमान को मिलते हैं तथा शनि की स्वार्थी व आत्मकेंद्रित क्रियाओं की हनुमान जी निःस्वार्थ भाव से प्रतिक्रिया देते हैं। इसी प्रकार यदि आप भी अपने अहं भाव, गर्व और स्वार्थ को छोड़कर हनुमान जी की तरह ही अच्छे, विनम्र, परमार्थी व सेवा भाव से परिपूर्ण हो जाएं तो आप शनि की साढ़ेसाती में भी शनि के जाल से बच जाएंगे। याद रखें शनि ने हनुमान जी को एक बार नहीं बल्कि अनेकों बार कष्ट पहुंचाए जबकि संकट मोचक श्री हनुमान जी अपनी विनम्रता, सादगी और अन्य श्रेष्ठ गुणों के कारण सदा विजयी रहे। 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ *पं अजय शर्मा* *कुल पुरोहित एवं ज्योतिष विश्लेशक* 7837789520 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️

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